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कितनी जवाबदेह है महिला प्रतिनिधि

वीणा सबलोक पाठक,  भोपाल, मध्य प्रदेश

राजधानी भोपाल में जिला पंचायत अध्यक्षों के प्रशिक्षण कार्यक्रम में इसकी झलक स्पष्ट दिखाई दी। सरकारी स्तर के इस कार्यक्रम में प्रत्येक महिला प्रतिनिधि के साथ उनके परिवार का कोई न कोई पुरूष सदस्य उपस्थित था, और तो और इनमें से अधिकांश प्रशिक्षण का हिस्सा भी बने और जमकर दखलअंदाजी भी की। जबकि मध्यप्रदेश के पंचायत एवं ग्रामीण विभाग की ओर जारी निर्देषों में स्पष्ट रूप से इस बात का उल्लेख है कि किसी भी प्रशिक्षण अथवा बैठक या फिर सरकारी कार्यक्रम में केवल चुने हुए प्रतिनिधि ही हिस्सा ले सकते है। लेकिन मुख्यमंत्री और विभाग के मंत्रियों की उपस्थिति में इस नियम का पालन होना तो दूर सरकारी प्रशिक्षण में इसका जमकर दुरूपयोग हुआ। ग्वालियर के पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष और वर्तमान अध्यक्ष रमादेवी के पति रामभरन सिंह गुर्जर की मांग थी कि अध्यक्ष को मिली सरकारी गाड़ी में पीली की जगह लाल बत्ती की पात्रता दी जाए। जबकि देवास की जिला पंचायत अध्यक्ष कमला गोस्वामी के पति सरकारी वाहन में पेट्रोल बढ़ाने की मांग करते रहे।

वास्तव में इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम उन महिलाओं के लिए भी बेमानी हो जाते हैं जो वास्तव में सीखने की इच्छुक है। आरक्षण के जरिए यदि महिलाओं के हाथों में सत्ता सौंपी गई है तो उसे मजबूती देने की जिम्मेदारी भी सरकार को उठानी होगी। महिला प्रतिनिधियों के पारिवारिक सदस्यों की दखल अंदाजी रोकने के लिए सख्त कदम भी उठाने होंगे। तभी सही मायने में महिला आरक्षण की सार्थकता सिध्द होगी।


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आंगनबाड़ी की मदद से प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा

सुधा कुमारी्, दरभंगा, बिहार

शिक्षा में गुणात्मक सुधार लाने के लिए कई महत्वाकांक्षी पहल और नई योजनाएं प्रांरभ की गई है। बड़े पैमाने पर शिक्षकों की नियुक्ति, पंचायती राज संस्थाएं एवं नगर निकायों के माध्यम से की गई है, नये स्कूलों की स्वीकृति दी गई है। नये स्कूल भवनों का निर्माण किया गया है। स्कूल जाने वाली बच्चियों को पोशाक और साईकिलों के लिए धन राशि दी जा रही है। अब तक 36 लाख 81 हजार बालिकाओं को पोशाक योजना और 13 लाख 60 हजार बालिकाओं को साईकिल योजना के अर्न्तगत लाभान्वित किया गया है। गुंजा फरजाना जो कि केन्द्र नं0 78 की सेविका है और आंगनबाडी चलाती हैं। इन्होंनें मदरसा अनवारुल ओलूम पैगम्बरपुर (फोकनिया) मैटि्रक पास किया हैं। इन्होंने बताया कि आंगनबाडी बच्चों के शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए खोली गई है। जिसमें बच्चों को सही शिक्षा और सही मार्गदर्शन मिल सके। मधुबनी जिले के अन्तगर्त इस आंगनबाडी में फिलहाल 40 बच्चें शिक्षा ग्रहण कर रहे है।

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ई-कचरे का बोझ ढोती धरती

नवनीत कुमार गुप्ता, दिल्ली

ई-कचरे से आशय उन तमाम पुराने पड़ चुके बेकार बिजली के उपकरणों से है, जिन्हें उपयोग करने वालों ने फेंक दिया है। इनमें कंप्यूटर, टीवी, डीवीडी प्लेयर, मोबाइल फोन, एमपी-थ्री व अन्य इलेक्ट्रोनिक उपकरण शामिल है। ई-कचरे में मौटे तौर पर लौह और अलौह धातुएं, प्लास्टिक, कांच, लकड़ी, कंक्रीट और सेरामिक, रबर और दूसरा पदार्थ शामिल हैं। ई-कचरे में कैडमियम, शीशा, पारा, पोलिक्लोरिनेटेड बाई फिनाइल, ब्रोमिनेटर फ्लेम रिटाडर्डेंट जैसे जहरीले पदार्थ भी हो सकते हैं। इस समय विश्‍व में पैदा होने वाले कुल कचरे में ई-कचरे का हिस्सा करीब 5 प्रतिशत है। जो प्लास्टिक कचरे के बराबर है। ई-कचरे में लगभग 1000 ऐसे पदार्थ होते हैं जो जहरीले होते हैं और जिनका निबटान अगर सही तरीके से न किया गया तो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को खतरा हो सकता है।

भारत में पैदा होने वाले कुल ई-कचरे का 70 प्रतिशत देश के 10 राज्यों से आता है। सबसे ज्यादा ई-कचरा पैदा करने वाले शहर मुंबई, दिल्ली, बंगलुरु, चेन्नई, कोलकाता, अहमदाबाद, हैदराबाद, पुणे, सूरत और नागपूर हैं। ई-कचरे से संबंधित भारत सरकार के दिशानिर्देश में कहा गया है कि वर्ष 2005 में देश में 1,46,180 टन ई-कचरा पैदा हुआ। ऐसा अनुमान है कि वर्ष 2012 तक यह मात्रा आठ लाख टन तक पहुंच जाएगी।


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आदिवासी युवाओं का जारी है पलायन


दिनेश कुमार साहू, भानूप्रतापपुर, छत्ती सगढ

वर्तमान समय में अधिकांश युवक बेरोजगारी की समस्या से जुझ रहे है। इसके चलते बहुत से युवक अच्छे काम एवं दाम की वजह से छत्तीसगढ से बाहर दूसरे राज्य में जा रहे है। जो भविष्‍य में एक गंभीर चिंता का विषय बन जायेगा इसका एक प्रमुख कारण रोजगार की तुलना में अधिक जनसंख्या वृद्वि हैं। आजकल युवा शिक्षित होने के बाद उनकी मनोवृति होती है कि वे नौकरी ही करे उनके मन मे यही बात बैठ जाती है। वो दूसरा काम करना पसंद नही करते इससे युवा शक्ति का दुरूपयोग होता हैं क्योंकि इस समय वे युवा अवस्था के शिखर पर होते है और अपने को बेकार पाते हैं। अपने उध्देश्‍य के अभाव में अक्सर युवा वर्ग असामाजिक एवं हिंसात्मक गतिविधियों की ओर अग्रसर हो जाते हैं, जो कि स्वंय एवं समाज के लिए बहुत ही नुकसान दायक हो सकता हैं।

भानूप्रतापपुर में एक शासकीय महाविद्यालय है और यह कूशाभाउ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्‍वविद्यालय के अन्तर्गत आता है। यहां लगभग 700 छात्रों में से 600 छात्र आदिवासी है, जो भानूप्रतापपुर ब्लॉक के ही छोटे छोटे गांवों से आते हैं। इस छोटे से ब्लॉक में 30 से 40 छात्र पत्रकारिता की पढ़ाई पढ़ रहे हैं। वे इस उद्वेश्‍य से पत्रकारिता की पढ़ाई पढ़ रहें हैं ताकि अपने समाज में कुछ बदलाव ला सके। इसके अलावे सभी छात्र कला या वाणिज्य की पढ़ाई पढ़ रहे है, सभी छात्र स्नातक के हैं। इन सभी आदिवासी छात्रों का भविष्‍य कहीं न कहीं राज्य सरकार पर ही टिका हुआ है। वे इन्हे रोजगार के अवसर के बारे में सोचें ताकि वे पलायनता का शिकार न हो। राज्य में पढ़े लिखे बेरोजगारों की संख्या बढ़ते ही जा रहे हैं।


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‍कश्‍मीर की अनोखी दास्तान

फयाज हमीद, कुपवाडा, जम्मू और कश्मीर


एक ऐसे गरीब खानदान की दर्द भरी दास्तान जो पिछले कई सालों से खुदा की आजमाइसों से मुस्सल गुजर रहा है। कुपवाड़ा से 12 किलोमीटर दूर वादी लोलाब के वभूरा गांव के रहने वाले अब्दुल गफर मोची की षादी आज से 20 साल पहले इसी गांव की रहने वाली राजा नामी खातून से हुई। दोनों पति पत्नी षादी के बाद काफी खुष थे। षादी के पांच साल बाद राजा ने एक लड़के को जन्म दिया। इस लड़के को जन्म देने के दो साल बाद जब पति पत्नी को यह इल्म हुआ कि यह लड़का दिमागी तौर पर मरीज है और साथ साथ नांतवा भी है तो इस घर में मातम छा गया। अब्दुल हमीद नामक इस लड़के की हालत को देखकर इसके मां बाप खून के आंसू रोते थे। अब्दुल हमीद के बाद राजा ने एक लड़की को जन्म दिया, जिसका सेहद और दिमाग दोनों ठीक थे। सतीमा नामी इस लड़की के बाद इस बदनसीब घराने में एक और लड़के ने जन्म लिया लेकिन खुदा को इस वक्त भी कुछ और ही मंजूर था। वह लड़का भी बात करने से कासिर और सेहत से नांतवा साबित हुआ। फिर पूरे घर में मायूसी के बादल मंडराने लगे। गफर मोची और राजा अपने दो नांतवा बेटों की हालत को देखकर इस नतीजे पर पहुंचे कि यह उपर वाले कि तरफ से आजमाइस है लेकिन आजमाइसों का सिलसिला यहीं खत्म नही हुआ।


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